आदिवासी

by Nisha Nandini
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हाँ! मैं आदिवासी हूँ
मैं धरती का मूल निवासी हूँ
मैं नहीं जानता
आधुनिक चाल-चलन
दिखावा, छल-कपट, फरेब
मुहँ में राम बगल में छुरी की भाषा
दोगला जीवन
मैं नहीं हूँ रंगा सियार
नहीं सीखा मैंने लोगों को
धन की तराजू पर तौलना
गिरिजन कहलाता हूँ

मैं करता हूँ धरती की सच्ची रक्षा
नहीं करता मैं नदियों को दूषित
तुम्हारी तरह
नहीं घोलता मैं हवा में जहर
तुम्हारी तरह
नहीं करता मैं प्रकृति को नष्ट
तुम्हारी तरह
हाँ! मैं बिना लिखा पढ़ा
आदिवासी हूँ

नहीं है मुझे तहजीब.
तुम्हारी तरह
मैं नहीं बोल सकता हूँ
तुम्हारी कृत्रिम भाषा
पर मैं समझता हूँ
प्रकृति का महत्व
जंगल, नदी, पर्वत,
झरनों का महत्व
मैं समझता हूँ

रोशनी देने वाले
सूरज का महत्व
इनकी रक्षा के लिए
करता हूँ इन सबकी पूजा
मुझे चिंता है वनजीवों की
मुझे चिंता है वनस्पति की
मुझे चिंता है तुम्हारी
मुझे चिंता है धरती की
हाँ ! मैं अनपढ़ गंवार.
आदिवासी हूँ
हाँ! मैं आदिवासी हूँ ।

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