सुर की झंकार

by Surekha "Sunil" Sharma
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संगीत और नृत्य के संबंध में भारत अपने अतीत पर गर्व कर सकता है और ऐसा करना न्यायोचित होगा। संगीत और नृत्य की परंपरा का आरंभ वेदों के समय से माना जाता है इस तथ्य को एक हद तक मान्यता मिल चुकी है कि भारतीय संगीत का आरंभ वेदों से ही हुआ है। वेदों में ही इसकी जड़ है। संगीत का विकास क्षेत्रीय प्रतिभा के लोक अनुरूप शैली में हुआ और धीरे-धीरे उसने शास्त्रीय संगीत का रूप धारण कर लिया, यदि शास्त्रीय संगीत भारत के अलग-अलग भागों में भिन्न-भिन्न है, किंतु उन सब के पीछे एकता की एक धारा अवस्थित है।


गीत शरीर है तो संगीत उसकी आत्मा। नाद में लय उत्पन्न होने से उसे उसके जीवन अर्थात दूसरी भूमि का उदय होता है। लय कविता का प्राण है। इसी लय से कविता में गति, जीवन और उल्लास का अनुभव होता है। नाद और लय संगीत का विशुद्ध रूप है।


सूत्र साहित्य के अनुसार विवाह आदि अवसरों पर कन्या की सखियां गायन, वादन एवं नृत्य प्रस्तुत करती थी। राज्य में भी नर्तकी यां विशेष स्थान रखती थी। संगीत संबंधी कोई ऐसा अवसर ना था जिसमें महिलाओं का सहयोग ना हो। महाभारत काल में भी संगीत का पुरुषों की भांति महिलाओं में भी भरपूर प्रचार था। संगीतज्ञ स्त्रियों की पुरुषों की दृष्टि में अधिक प्रतिष्ठा मान व इज्जत समझी जाने लगी नारी को जब संगीत प्रवा हिनी और संगीतमय गति माना जाता था। आदि कवि वाल्मीकि लिखते हैं कि धनुष तोड़े जाने पर देवताओं ने दुंदुभी बजाई नृत्यांगना ने नृत्य किया और सुंदरियों और सखियों ने मंगला चार के गीत गाए।


गुप्त काल संगीत के सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण काल है।इस काल में शास्त्रीय संगीत का महत्व स्पष्ट ही है क्योंकि अब उच्च कुल की कुमारिया खुली संगीत प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगी थी। राज्यों में नर्तकियों की नियुक्ति की जाती थी। वास वदत्ता, निपुणिका, हंस वती, शर्मिष्ठा, मालविका, आदि नारियों का संगीत के साथ घनिष्ठ संबंध, इसी बात का घोतक है। गीत रचना में भी स्त्रियों का विशेष स्थान था। अशोक के राज्य में अनेक नारियां नृत्य और गायन में पारंगत थी। हर्षवर्धन युग में एक महा कवि की कविता को संगीत में रचना बनाकर नारियां अपने आमोद प्रमोद के लिए गाया करती थी। मुगल काल में ग्वालियर नरेश राजा मानसिंह, जो संगीतज्ञ का बहुत सम्मान करता था। ने बैजू बावरा संगीतज्ञ को अपने दरबार में रखा और अपनी रानी मृगनयनी को उन से संगीत की शिक्षा दिलाई। बैजू बावरा रानी मृगनयनी के नाम पर गुजरी तोड़ी, मंगल गुजरी इत्यादि रागों की रचना की। मध्यकाल में रूपमती एक बड़ी संगीतज्ञ थी उनकी गायन में निपुणता की प्रसिद्धि गान विशारद तानसेन तक पहुंची हुई थी। बाज बहादुर तथा रानी रूपमती में संगीत ही उनके अटूट प्रेम की शुरुआत थी। रूपमती सुंदर गीत स्वयं लिखती थी तथा उन प्रेम गीतों की अभिव्यक्ति भी स्वयं करती थी। मध्यकालीन युग की राजस्थानी गायिका चंद्रमुखी एक कुशल लोकप्रिय संगीतज्ञ थी।


अहमदनगर के सुल्तान की पुत्री चांदबीबी जो वीणा के साथ सितार बजाने में भी सिद्धहस्त, महान संगीतकार थी,! गुलाम वंश के सुल्तान इल्तुतमिश की बेटी रजिया सुल्ताना संगीत की प्रेमिका एवं गायिका थी। मीराबाई का नाम लिए बिना संगीत का इतिहास अधूरा सा ही रहेगा। मीरा एक सफल गायिका कवित्री तथा संगीतज्ञ थी । इन्होंने कोई साथ राग रागनियां का अपने पदों हेतु प्रयोग किया। रागों की रचना हेतु कहरवा धमाल तीन ताल दादरा रूपक इत्यादि तारों का प्रयोग किया। मीरा भजन कीर्तन के समय मंदिर तथा साधु मंडलियों में नृत्य भी किया करती थी। पेशवा बाजीराव के समय में सुप्रसिद्ध गायिका मस्तानी भी हो चुकी है जिसके आलौकिक संगीत का प्रभाव बाजीराव पर बहुत  पड़ा।


शास्त्रीय संगीतकार सुश्री गंगूबाई हंगल किराना घराने से संबंधित थी। आप बड़ा ख्याल, छोटा ख्याल, तराना ठुमरी, सभी शैलियों में सिद्धहस्त थी। उनके प्रिय रागों में तोड़ी ,मारवा, पुरिया, शुद्ध कल्याण के रिकॉर्ड आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों में प्रसारित होते रहते हैं। जहां शिवजी को तांडव नृत्य के जन्मदाता के रूप में माना जाता है। वहां पार्वती जी लास्य नृत्य की जन्मदाता माने जाते हैं। नित्य क्षेत्र में भी स्त्री वर्ग आज पुरुष कलाकारों से कम नहीं है। इस क्षेत्र में पदम भूषण से सम्मानित रुकमणी अखंडेल भरतनाट्यम की प्रसिद्ध नर्तकी हैं। लखनऊ घराने की कत्थक नृत्यांगना सितारा देवी भरतनाट्यम मणिपुरी और लोकनृत्य में भी सिद्धहस्त हैं।


फिल्म संगीत भी हमारे समय की एक अनोखी देन है।उसकी फिल्मों में सिर्फ एक सहायक भूमिका नहीं है वह एक स्वायत्त और संपूर्ण दुनिया है। हमारी फिल्मों में अक्सर वह किसी भी और पक्ष से ज्यादा सृजनात्मक और महत्वपूर्ण दिखाई देता है। वह हमारी समय की लोकप्रिय भावनाओं की सबसे प्रमाणिक संगीत एक अभिव्यक्ति है। एक तरह से आधुनिक भारतीय समाज का दर्पण है। और लता मंगेशकर उसकी प्रतिनिधि आवाज है। वे परंपरागत सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों को बचाए रखती हैं वह पुराने असफल लेकिन श्रेष्ठ संगीतकारों की कीमत जानती हैं और उनका सम्मान करती हैं। आशा निराशा अवसरवादी उल्लासआनंद विरह एवं ममता से भरा स्वर जब कोकिल कंठी गायिका लता दीनानाथ मंगेशकर के गले से मुखरित होता है ,तो अलौकिक सुख की अनुभूति होती है।
लता के सामने कितनी गायिका ए आई और विस्मृति के गर्भ में विलीन हो गई, लेकिन लता मंगेशकर अपने स्थान पर अडिग और ध्रुव तारे की तरह अटल रही। आज भी हिंदी फिल्मों में उनकी उतनी ही मांग है जितनी हमेशा रही है।


सुगम संगीत के क्षेत्र में भी महिलाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। फैजाबाद की बेगम अख्तर ग़ज़ल गायकी में बेजोड़ थी। उनके कंठ की मधुरता सुरीला पन अदायगी अत्यंत प्रभावशाली थी। सुरैया नूरजहां खुर्शीद बेगम अमीरबाई ,कर्नाटकी पारुल घोष, हमीदा बानू ,सुलोचना कदम आदि अपने समय की सिने जगत की विख्यात गायिका रही।कंठ कोकिला लता मंगेशकर सुगम संगीत के क्षेत्र में भी भारत का मस्तिष्क विश्व भर में ऊंचा किए हुए हैं। यह अपने मधुर कंठ से अब तक अनगिनत गीत गा चुकी हैं। यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा की सुर और झंकार हमारे जीवन में एक अत्यंत आवश्यक जगह बनाए हुए हैं।।

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