अनुशासनहीनता

by Surekha "Sunil" Sharma
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आज भारत में जिस तेजी से जनसंख्या में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है, उस कारण से कई विकराल समस्याओं ने भयानक रूप धारण कर लिया है! आज हमारा देश कई राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना कर रहा है जिनमें असम, पंजाब, राम जन्मभूमि की समस्याएं तो है ही ।
यदि हम “अनुशासन” का शाब्दिक अर्थ लें, तो स्पष्ट तथा इसका आशय है, शासन के पीछे पीछे चलना अर्थात हमें अपने महापुरुषों जैसे गांधी, पटेल, शास्त्री जैसे सिद्ध पुरुषों की भांति उनके आदर्शों तथा नियमों में जीवन व्यतीत करना चाहिए!

किंतु कितने लोग आज ऐसे हैं जो दावे के साथ कह सकते हैं कि वे इन आदर्शों और नियमों के आधार पर अपना जीवन लक्ष्य निर्धारित करते हैं! वास्तव मैं हमें अनुशासन की पूर्ण शिक्षा ही नहीं दी गई है अन्यथा आज हमारा देश समस्याओं से घिरा हुआ ना होता!


अनुशासन हीनता आज भारत की ही नहीं, वर्णन संपूर्ण विश्व की समस्या है। अनुशासन की उपेक्षा करने से ही जनजीवन अस्त-व्यस्त होकर रह जाता है तथा समाज में अव्यवस्था ने जन्म ले लिया है। आज शासन ने उच्च वर्ग से लेकर भिकारी और मजदूरों तक में इस व्याधि ने जन्म ले लिया है। अनुशासन की उपेक्षा करना आज प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार बन गया है।


व्यक्ति जब अनुशासन की उपेक्षा करता है तो तोड़फोड़ आगजनी और हिंसा की व्यापक विनाश लीला आरंभ कर देता है।अभी अगर बात करें तो दिल्ली पुलिस और वकीलों के बीच जो अनुशासनहीनता हुई है आज सबसे गर्म मुद्दा वही है। एक तरफ तो कानून बनाने वाले और दूसरी तरफ कानून की रक्षा करने वाले दोनों ही आपस में लड़ाई झगड़ा बढ़ा रहे हैं, यहां इन दोनों की अनुशासनहीनता ही है। आज का युवा वर्ग इसी प्रकार की अनुशासनहीनता का शिकार हो गया है, वह बहुत ही गंभीर समस्या है। आज प्रत्येक वर्ग इसी के चंगुल में फंसा है और यह स्थिति अराजकता अंधकार में भविष्य व निराशा को ही व्यक्त कर रही है।


आज भारत में हर जगह अनुशासन की उपेक्षा हो रही है चाहे वे निजी कार्यालयों सरकारी दफ्तर कालेज या परिवार हो। जिस अनुशासन में व्यक्ति अपनी बौद्धिक मानसिक हर प्रकार की उन्नति कर सकता है उसी की उपेक्षा करके वह आज समस्या रूबी मकड़ी के जाले में फसता ही जा रहा है।
आम व्यक्ति ही नहीं हमारे शासक अर्थात सांसद भी अपने व्यवहार से संसदीय मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। यदि वे स्वयं ही अनुशासित नहीं होंगे तो प्रजा को कैसे करेंगे? क्योंकि” यथा राजा तथा प्रजा”

गांधी जी ने शासकों के लिए सदा सादा जीवन उच्च विचार का आदर्श रखा था। किंतु आज किसी को यह आदर्श याद भी नहीं है! मंत्री सांसद अधिकारी आदि समस्त नियमों और आदेशों का को ताक पर रखकर मोटर विमानों गाड़ी आदि का प्रयोग अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिए करते हैं! हमारे राजनीतिक आज बुद्धि शून्यता की स्थिति में है और अमर्यादित हरकतों पर उतर आए हैं नेता कुर्सी की इच्छा और पद लोलुपता के आगे सब कर्तव्यों को भूल गए हैं! अपने द्वारा बनाए नियमों की वे स्वयं अवहेलना कर रहे हैं! आज कार्यालय संस्थाओं में अराजकता है सामान्य सी बात पर उपद्रव नियमों की अवहेलना हड़ताल आंदोलन साधारण बात हो गई है। किसी को भी कर्तव्य बोध नहीं है। यह सभी अनुशासन की उपेक्षा के परिचायक हैं, जिसका फल सभी को भुगतना पड़ता है!


विद्यार्थी भी अपनी मांगे मनवाने के लिए अनुशासन भंग करते हैं, नियमों की अवहेलना शिक्षकों के साथ मारपीट शिक्षा संस्थाओं में आग लगाना आंदोलन करना आदि अनुशासनहीनता के प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसी अनुशासन की उपेक्षा से छात्रों में विनम्रता श्रद्धा-लगन आदि का अभाव हो चला है। राजनीति से प्रेरित होकर कोई भी झमेला खड़ा कर देते हैं, जो स्वयं उनके भविष्य के लिए घातक है। आज परिवारों में भी अनुशासन नाम की कोई चीज दिखाई नहीं पड़ती। संयुक्त परिवार प्रथा का आज विघटन हो रहा है परिवार के मुखिया द्वारा स्थापित आदर्शों और नियमों की उपेक्षा हो रही है। परिवारों में आपसी फूट, वैमनस्य, ईर्ष्या आदि ने अपना  स्थान बना लिया है। जिससे परिवार की एकता और अस्मिता नष्ट हो गई है।


आज इसी अनुशासन की उपेक्षा के कारण हमारा देश चारों ओर से समस्याओं से घिर गया है कुशल नेतृत्व के अभाव में हर जगह सांप्रदायिक दंगे हो जाते हैं। आज सड़क पर बैठने वाले से लेकर आलीशान कोठियों में रहने वाले तक सभी अनुशासन की उपेक्षा कर रहे हैं। कोई नियमों की परवाह नहीं करता भारत के जनजीवन में चाहे वे जूते ठीक करने वाला हो या सब्जी वाला, ठेलेवाला या मोटर चलाने वाला सभी व्यक्ति अनुशासन सिद्धांत आदर्शों की अवहेलना कर रही है।


अनुशासन का आदर्श अंग्रेजी कवि टेनिसन की कविता जिसका शीर्षक “the charge of the light brigade” है की इन पंक्तियों में बताया गया है। अपने विवेक और बुद्धि द्वारा मन पर नियंत्रण करना ही अनुशासन कहा जाता है! आज जहां भी देखें वहां हमें “पर उपदेश कुशल बहुतेरे “ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे! आज हमारे जीवन में जो अनुशासनहीनता व्याप्त है। उसका जिम्मेदार राजनेताओं का स्वार्थ और असामाजिक तत्वों द्वारा फैलाई गई अव्यवस्था और स्वार्थपरता है। हमारे देशवासियों में वह शक्ति और क्षमता है जिन्होंने शासन को बदल कर रख दिया है और सामाजिक मूल्यों को प्रतिष्ठित किया है। यदि बढ़ती हुई इस अनुशासन की उपेक्षा को समय रहते न रोका गया तो इसके परिणाम निश्चित ही बहुत बुरे होंगे और हमें तथा हमारे देश को ले डूबेंगे।

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