हल्के होते साहित्यिक मंच

by Nisha Nandini
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मुझे आज भी याद आते हैं वे दिन, जब हमारे शहर में कवि सम्मेलन और मुशायरा होता था । कवियों को सुनने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी क्योंकि उस समय मंचों की एक गरीमा होती थी । कविगण भी साहित्य तथा देश को समर्पित होते थे । उनकी रचनाओं में सच्चाई तथा सादगी झलकती थी ।


जब वे मंच पर आते थे तो तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूंज उठता था । लोग दुबारा सुनने की चाहत रखते थे । हास्य रस में भी स्वस्थ व्यंग्य प्रस्तुत करते थे । वीर रस में उनके दिल से निकली एक सच्चे  दर्द की आवाज होती थी । श्रृंगार रस को भी वे बड़ी गरीमा से प्रस्तुत करते थे । कवयित्रियों में एक शालीनता व सौम्यता होती थी । वेशभूषा का सलीका होता था । मंचों का बड़प्पन होता था।


        पर आज के मंचों को देखकर बहुत दुख होता है। आज सिर्फ दिखावा मात्र रह गया है । मंच हल्के होते जा रहे हैं। उनकी गरीमा समाप्त हो गई है । आज हर गली मोहल्ले में कवि सम्मेलनों के नाम पर यश की लालसा दिखाई देती है। हर दूसरा व्यक्ति अपने आप को कवि कहता है । माइक पकड़ कर फोटो खींचवाना ही उनका एक मात्र उद्देश्य है । हास्य रस में फूहड़ता व अनैतिकता दिखाई देती है। वीर रस में कृत्रिमता झलकती है । श्रृंगार रस में उथलापन झलकता है।

कथित कवयित्रियों के विषय में तो मैं क्या कहूँ ।आप सब भी आँख और कान तो रखते ही हैं। इनके द्वारा साहित्य समाज को दूषित किया जा रहा है। लोग इनका अनुचित लाभ उठा रहे हैं। पर यह महिलाएं कोई नासमझ तो नहीं हैं । फिर क्यों समाज की दुहाई दी जाती है। मंच की शालीनता छू मंतर हो चुकी हैं। साहित्य के नाम पर यह साहित्यकार क्या कर रहे हैं। क्यों वे साहित्य  और स्वयं को इतना नीचे गिराने में लगे हैं ।


मुझे तो कई बार धोखा हो जाता है कि यह साहित्य प्रेमी कवियों का मंच है या मॉडलिंग का? एक तरफ हम समाज को सुधारने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ हम बुद्धिजीवी लोग ही समाज में गंदगी फैला रहे हैं। अगर कोई अच्छा कवि मंच पर आ भी जाए तो लोग सुनना नहीं चाहते हैं। हम सभी में  एक प्रकार का अभिमान होने के कारण सहनशीलता व धैर्य की कमी दिखाई देती है।


शहर में यदा-कदा  कुछ धनाढ्य वर्ग के लोग हास्य कवि सम्मेलन करवाते रहते हैं। जिसमें 700 से 1000 रूपये तक का टिकट लिया जाता है। बाहर से कवियों को बुलाया जाता हैं जिसमें  एक-एक कवि पर सब मिलाकर लगभग पचास हजार का खर्च आ जाता है। । पर उन कवियों के पास सुनाने को क्या होता है। यह आप खुद समझ सकते हैं। आप और हम कोई अज्ञानी तो हैं नहीं ।लोग आज भी अच्छे कवियों को सुनना चाहते हैं। पर मंच सजाने वाले लोगों को अच्छों की पहचान तो हो। अगर हमारे देश के कवि सम्मेलनों के मंचों का यही हाल रहा तो वे दिन दूर नहीं जब कवियों को बहुत नीची दृष्टि से देखा जाएगा । लोग ऐसे मंचों पर जाने से पहले दस बार सोचेगें । मंच हल्के होने का अर्थ कवियों का हल्का होना है ।


कवियों का पद बहुत प्रतिष्ठित व गरीमामय होता है । वे समाज व देश को दिशा देने का कार्य करते हैं । उनके कलम की आवाज अद्भुत होती है । वे देश   व दुनिया को बनाने की ताकत रखते हैं।याद कीजिए “दिनकर” और “निराला ” को “शैल चतुर्वेदी” और नीरज को जिनके मंच पर आते ही मंच गरिमामय हो जाता था ।


अब हम सब स्वयं ज्ञानी हैं । हमें क्या करना है कहाँ बदलाव लाना है या नहीं लाना है यह फैसला अब आपके हाथों में है।

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