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स्वामिभक्ति..

by Dr. Awadhesh Tiwari
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      मेरा संस्मरण एक सच्ची घटना पर आधारित है।मेरी उम्र उस समय 10 वर्ष थी।मैं कक्षा 5 में पढ़ रहा था।मेरे घर एक भैंस थी जिसे पूरा परिवार लक्ष्मी कहकर बुलाता था।मैं उसे बहुत प्रिय था।


       स्कूल से आने के बाद मैं उसे घास चराने गाँव के पास नदी के किनारे ले जाता था।विशेष बात यह थी कि मैं उसकी पीठ पर बैठ कर गन्ना चूसता रहता और वो घास खाती।जब तक मैं उसकी पीठ पर न बैठता, न उसे चैन मिलता न मुझे। लक्ष्मी मुझे अपने पँड़वे से भी ज्यादा प्यार करती थी।


     एक दिन मैं उसकी पीठ पर बैठकर गन्ना चूस रहा था,वो नदी के किनारे घास खा रही थी।अचानक लक्ष्मी पानी पीने नदी में उतर गई,शायद वो भूल गई कि मैं उसकी पीठ पर बैठा हूँ।
लक्ष्मी पानी पीते हुई नदी में डुबकी लगा ली।मैं चिल्लाया,पर तब तक देर हो गई थी।मैं डूबने लगा। तब तक लक्ष्मी को अपनी गल्ती का एहसास हो चुका था। मेरे बाल लम्बे थे (क्योंकि मेरी माँ को मुझ पर लम्बे बाल अच्छे लगते थे और वो मुझे कान्हा कह कर बुलाती थीं)


लक्ष्मी ने अपने दाँतों से मेरे बाल पकड़े और मुझे खींचकर किनारे लाई और जोर -जोर से चिल्लाने लगी।मैं डर और घबराहट से बेहोश हो चुका था।लक्ष्मी की दर्द भरी आवाज को सुन आसपास खेतों में काम करने वाले लोग दौड़कर आये,मेरे पेट में गये पानी को निकाला और मुझे लेकर मेरे घर आए।


    लक्ष्मी की आँखों से आँसू लगातार बह रहा था,हमारे पीछे-पीछे वह भी घर आई।
मेरी अम्मा को देखकर वो और जोर – जोर से चिल्लाने लगी।


अम्मा को लोगों ने सारी बातें बताई।अम्मा ने केवल इतना ही कहा?लक्ष्मी तुझसे ये उम्मीद नहीं थी।उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।वो वहीं दरवाजे पर बैठ गई।जब तक मैं ठीक होकर उसके पास नहीं आया, उसने कुछ नहीं खाया। दूसरे दिन मैं उसको चराने नहीं ले गया।मेरा छोटा भाई लक्ष्मी को ले जाने लगा लेकिन वो नहीं गई, उसे उसने बहुत मारा। लेकिन फिर भी वो नहीं गई।


जब मैंने उसके चिल्लाने और भाई की आवाज सुनी तो मैं अम्मा के साथ गया और उसकी पीठ पर बैठा। तब वो शांत हुई और मेरे साथ चरने गई।


जब तक वो जिन्दा रही हम सब उसे परिवार के सदस्य की तरह समझते और मानते रहे। आज भी लक्ष्मी की याद मेरे मनोमस्तिष्क में मेरी माँ की तरह विद्यमान है।


कहने को वो भैंस थी किन्तु मेरे लिए किसी भी रूप में मेरी अम्मा से कम न थी…

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