अर्थहीन पुरस्कार

by Nisha Nandini
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संजीव और निगम दोनों स्टेट बैंक में काम करते थे। दोनों में मित्रता के साथ-साथ थोड़ी बहुत ईर्ष्या भी थी। जब मिलते तो लगता कि बहुत गहरे मित्र हैं लेकिन पीठ पीछे दोनों एक दूसरे की बुराई करते रहते थे। जब कोई बैंक अधिकारी निगम की प्रशंसा करता तो संजीव को अच्छा नहीं लगता था। वह हमेशा उसकी कमियां लोगों को बताया करता था।

एक दिन अचानक कार दुर्घटना में निगम अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। उसे बैंक की नौकरी से भी हाथ धोना पड़ता है। उसकी पत्नी नीता अपने दो छोटे बच्चों के साथ मुसीबत के दिन व्यतीत कर रही थी। अब संजीव हर समय अकेला महसूस करता था और अपने मित्र निगम को याद करके उदास हो जाता था। वह अपने मित्र निगम के परिवार की यथासंभव सहायता करता। हर किसी से निगम की प्रशंसा करता रहता था। दो साल बाद हार्ट अटैक से निगम की मृत्यु हो जाती है और उसी साल निगम को बैंक की ओर से एक कर्मठ कर्मचारी का अवार्ड दिया जाता है। जिसे निगम की पत्नी नीता बड़े दुख के साथ ग्रहण करने जाती है,और अपने वक्तव्य में कहती है कि अगर यह पुरस्कार निगम को पहले मिल जाता तो शायद खुशी से उसकी मानसिक स्थिति भी ठीक हो सकती थी। जिसको यह पुरस्कार मिला है वह तो अब रहा नहीं। अब इस पुरस्कार का हमारे लिए क्या महत्व है। सरकार को जीवित अवस्था में पुरस्कार देने की योजना बनानी चाहिए। जिससे उसका उत्साह वर्धन होगा।


यहां एक प्रश्न एक भाव बहुत कचोटता है। कल तक हम जिसको अपशब्द बोलकर बुरा-भला कहते हैं। आज उसके मरते ही सब बुराइयां समाप्त हो जाती हैं। केवल अच्छाइयां ही दिखने लगती हैं। हम जीते जी किसी के गुणों को क्यों नहीं देख पाते हैं। इसका मुख्य कारण हमारा अंहकार और हमारी नकारात्मक सोच है। हम पूरे जीवन भर स्वयं को छोड़कर दूसरो में सिर्फ कमियां ढूंढने में लगे रहते हैं।

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