हमारा आदर्श समाज

by Surekha "Sunil" Sharma
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आदर्श समाज की धारणा समय व परिस्थितियों के अनुसार हमेशा बदलती रहती है। कभी धर्म तथा नैतिकता पर आधारित समाज को ही आदर्श समाज कहा गया है। आधुनिक समाज में मुक्त समाज को ही आदर्श समाज माना गया है । जिसमें व्यक्ति को अपनी पूर्ण प्रतिभाओं को विकसित करने का पूरा अवसर प्रदान किया जाता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि प्रत्येक समाज के कुशल संगठन व संचालन के लिए ,धार्मिक व नैतिक मूल्यों का होना अति आवश्यक है।

गांधी जी ने भी इसी आधार का समर्थन किया है ,उनका कथन है सत्य कर्म और सच्ची नैतिकता एक दूसरे से अपृथक रूप से बंधे हुए हैं। धर्म का नैतिकता से वही संबंध है जो भूमि में बोए हुए बीज के साथ जल का है।     ऐसा कोई धर्म नहीं होता ,जो नैतिकता का अतिक्रमण कर सकें प्रमुख नैतिक मूल्य जैसे सत्य ,अहिंसा ,परोपकार ,दया को विशेष मान्यता मिली है।

एक सत्य यह भी है ,कि समाज में महान विचारों का प्रसारण व प्रवाह हरण महापुरुषों की महानता ओं के प्रयासों से ही संभव हुआ है।यह महापुरुषों के लिए आदर्श प्रतिमान के रूप में प्रसिद्ध होते रहे हैं ,इनके आदर्श स्वयं केवल अपने लिए ही नहीं रहे ,समूचे समाज के लिए अनुकरणीय रहे हैं।ऐसे महापुरुषों की गाथाओं से आज भी इतिहास भरा पड़ा है, जो हम सब के लिए स्वर्णिम पूंजी है। यह महान आत्माएं समाज को बदलने में अपना पूरा योगदान देती रही है। जैसे रामकृष्ण, ईसा मसीह, गौतम बुद्ध ,कबीर ,नानक व महात्मा गांधी आदि… प्लेटो ने अपनी प्रमुख कृतियां रिपब्लिक ने ऐसे महान प्रशासक की कामना की है ,जिसे प्लेटो ने *दार्शनिक प्रशासक* कहा है।ऐसे ही मसीहा उनकी सतत प्रयासों द्वारा समाज में सद्भावना की वृद्धि होती रही है। यहां तक प्रशासनिक कार्यों की कुशलता से संचालित करने में ऐसे ही महान पुरुषों ने दिशानिर्देश का कार्य किया है। आधुनिक मुक्त समाज की धारणा में व्यक्तियों का कल्याण आधार ही समाया हुआ है। ऐसा समाज जिसमें ,व्यक्ति मुक्त होकर जी सके अपनी प्रतिभाओं को विकसित करने का ,मुक्त वातावरण मिल सके ,समाज के लिए योग्य व्यक्ति बन कर, अपना सक्रिय योगदान दे सकें। समाज में प्रजातांत्रिक व्यवस्था की स्थापना का यही कारण है।

यह समाज के स्वरूप एक दूसरे के विरोधी नहीं, परस्पर संबंधित हैं। केवल किस को किस समय महत्व अधिक दिया गया ,यह परिस्थितियों पर निर्भर है। आदर्श समाज वास्तव में तीनों का संगम है। समाज का धार्मिक व नैतिक आधार ,समाज की उर्वरा भूमि है ।जिसमें महान आत्माएं आकर जनकल्याण कर सकती हैं। किंतु यह अपनी महानता का तभी परिचय दे सकते हैं ।जब उन्हें मुक्त वातावरण मिले। नैतिक आदर्श केवल किताबी आदर्श होकर रह जाते हैं, यदि उनका क्रियान्वयन महापुरुषों द्वारा ना हो, इसी प्रकार मुक्त समाज में यदि मान सम्मान की संस्कृति नहीं, तो यह मुक्त समाज नहीं कहा जा सकता । इटज्योनी ने ऐसे ही समाज को सक्रिय समाज कहा है। एरिक फॉम ने पवित्र समाज कहा है। गांधी जी ने रामराज्य कहा है। कार्ल मार्क्स ने वर्ग विहीन समाज को आदर्श समाज माना है। आज का युवा समाज को किस दृष्टि से देखता है यह उस पर निर्भर करता है।।

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