विज्ञान और अध्यात्म

by Dr. Rajmati Surana
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अधिकतर लोग सोचते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म पूर्णतया विपरीत क्षेत्र हैं , पर ऐसा नहीं है। वस्तुत: वे एक ही सिक्के के दो पक्ष हैं। विज्ञान का लक्ष्य है , गहरी से गहरी आध्यात्मिक सचाइयों का खुलासा करना और अध्यात्म का लक्ष्य है-वैज्ञानिक तथ्यों के पीछे छुपे कारणों की खोज करना। वैज्ञानिक यह पता लगाना चाहते हैं कि यह सृष्टि कैसे बनी और हम इंसान कैसे बने ? हमारे ग्रह के ऊपर मंडरा रहा एक टेलीस्कोप किसी ‘ बिग बैंग ‘ या महाधमाके के अवशेषों को ढूंढकर दिखाने का प्रयास कर रहा है। अनेकों प्रकाश वर्ष दूर के संकेतों को पकड़कर , हम अरबों वर्ष पहले हुई गतिविधियों की झलक देखने की कोशिश कर रहे हैं। वैज्ञानिकों में होड़ लगी है कि कौन सबसे पहले यह खोज दिखाए कि सृष्टि के शुरू में क्या हुआ था। क्यों ? इंसान के भीतर यह इच्छा छुपी है कि वह खुद भी देख सके और दूसरों को भी दिखा सके कि ऐसी कौन सी शक्ति है , जिसने हमें सृष्टि में भेजा। शायद हर दिल में यह सिद्ध करने की इच्छा छुपी हुई है कि कहीं कोई महाशक्तिमान , अनंत ऊर्जा और ज्योति से संपन्न कोई प्रभु है और हम आत्मा हैं , उस प्रभु के अंश हैं। दूसरी ओर , जो रूहानियत या आध्यात्मिक साधना में लगे हैं , वे वैज्ञानिक तथ्यों के पीछे छुपे कारणों का पता लगाने की कोशिश में हैं। वे प्रकृति के वैज्ञानिक नियमों में तो रुचि रखते हैं , पर वे उन नियमों से भी आगे जाना चाहते हैं और उस दिव्य नियम को खोजना चाहते हैं , जिसके द्वारा सब कुछ अस्तित्व में आया। आखिर वे नियम बने कैसे , किसके द्वारा , किन कारणों से , किस विधि से। वैज्ञानिक बाहरी यंत्रों के द्वारा अपनी खोज करते हैं , रूहानी वैज्ञानिक इस भौतिक मंडल के ऊपर , चेतना के उच्चतर मंडलों में पहुँचकर अपनी खोज करते हैं। सभी धर्मों के ग्रंथ रूहानी अनुभवों और करामातों की बात करते हैं। कई लोग मौत जैसे अनुभव या नियर डेथ एक्सपीरिएंसिज का वर्णन करते हैं। हम बहुत से लोग ध्यान या समाधि में दिव्य अनुभव पाने की बातें करते हैं। जिनको लोग करामात कहते हैं , वे और कुछ नहीं , बल्कि इस सृष्टि के कुछ उच्चतर नियम हैं , जिनसे कि हम अनजान हैं। वैज्ञानिक महसूस करने लगे हैं कि यह संसार इतना ठोस नहीं , जितना कि हमने सोचा था। वास्तव में जड़ पदार्थ कंपन करती ऊर्जा है जो कि भौतिक आँखों को ठोस प्रतीत होती है। जब हम संसार को मूल अवयवों में बाँट देते हैं , तो हमें ऊर्जा , ज्योति और ध्वनि ही मिलते हैं। करामात करने का अर्थ कुछ और नहीं , बल्कि इस ऊर्जा को पकड़ना है और विचारों एवं आत्मा की शक्ति से इससे काम लेना है। पहले हम सोचते थे कि दवाइयों से बीमारियाँ ठीक होती हैं। इधर मन और शरीर के आपसी संबंध की बात कही जा रही है। चिकित्सक शरीर को स्वस्थ करने के लिए पहले मन को स्वस्थ करने और मन को स्वस्थ करने के लिए आत्मा की शक्ति का इस्तेमाल करने की बात कहते हैं। कुछ चिकित्सा संस्थानों में चिकित्सक मेडिटेशन या ध्यान लगाने को कहते हैं। एक जाँच से यह साबित हुआ है कि जो लोग मेडिटेशन या धार्मिक् u शिविरों में समय बिताते हैं , वे शल्य चिकित्सा के बाद उन लोगों की तुलना में जल्दी स्वस्थ होते हैं , जो ऐसा नहीं करते हैं। विज्ञान और अध्यात्म के बीच की रेखाएँ अस्पष्ट होती जा रही हैं। यह फैसला इंसान को करना है कि वह सिर्फ अपने लिए जीए या दूसरों की सेवा के लिए। और इस ग्रह को बेहतर बनाने में अपना जीवन बिताए। कुछ लोग सिर्फ अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए जीते हैं। पर जो लोग उच्चतर शक्ति के संपर्क में आ जाते हैं , वे जान जाते हैं कि हमारी जिंदगी का सर्वोच्च लक्ष्य प्रेम करना और दूसरों की सेवा करना ही है। वैज्ञानिक भी सिर्फ अपने लिए नहीं जीते। वे दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने वाले साधनों की खोज में अपनी जिंदगी गुजार देते हैं। रूहानी साधकों और भौतिक वैज्ञानिकों का लक्ष्य एक ही है। दोनों ही यहाँ प्रकृति के छुपे नियमों को खोजते हैं , उस उच्च सत्ता को खोजते हैं 

वैज्ञानिक आध्यात्मवाद को समझने के लिए हमें इस तथ्य पर ध्यान देना होगा कि हमारे समक्ष जो विश्व ब्रह्माण्ड है, वह मूलतः दो सत्ताओं से मिलकर बना है- एक जड़ व दूसरा चेतन। जड़ सत्ता अर्थात् पदार्थ का अध्ययन विज्ञान का विषय है जबकि चेतन सत्ता (आत्मा-परमात्माश् का अध्ययन अध्यात्म का विषय है। अतः इस ब्रह्माण्ड को पूरे तौर से समझने के लिए हमें इन दोनों ही सत्ताओं को ध्यान में रखना होगा।

भारतवर्ष में अध्यात्म और विज्ञान का सदा से समन्वय रहा है। वेद एवं वैदिक वाग्म्य विज्ञान और अध्यात्म को साथ-साथ लेकर चलते हैं, फिर चाहे आयुर्वेद हो अथवा वास्तु। पश्चिमी देशों में भी एक लम्बे अर्से तक विज्ञान एवं अध्यात्म साथ-साथ रहे। प्रत्येक वैज्ञानिक ग्रन्थ में परमात्मा की चर्चा पाई जाती थी। सर आइजेक न्यूटन ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘प्रिन्सपिया’ में परमात्मा की चर्चा करते हुए लिखा है कि परमात्मा ने इस ब्रह्माण्ड की रचना की और इसे एक संवेग प्रदान किया, जिसके कारण वह गतिशील है। उन्होंने यह भी लिखा कि ब्रह्माण्डरूपी नाटक के मंच पर जब कोई विकृति पैदा होती है, तो परमात्मा स्वयं उसे ठीक करता है। यह भाव कुछ इसी तरह का है जैसा की गीता में कहा गया है-

‘‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

परित्रणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।’

विज्ञान और अध्यात्म दोनों के लिए यह एक ऐसी घटना थी, जिसने उनके बीच एक दीवार खड़ी कर दी। जहां एक ओर इससे पूर्व दोनों एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य कर रहे थे, अब एक दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी हो गए। यद्यपि दोनों ही मानवता के हित में कार्यरत थे, किन्तु एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। परिणाम यह हुआ कि विज्ञान पर अध्यात्म का अंकुश नहीं रहा और वह स्वत्रंात रूप से इस प्रकार कार्य करने लगा कि नैतिक मूल्यों के प्रति उदासीन हो गया। दूसरी ओर विज्ञान से पृथक होने पर अध्यात्म अवैज्ञानिक मार्ग पर चल पड़ा और उसमें रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वास का बाहुल्य हो गया। स्वाभाविक है कि समाज पर इसका कुप्रभाव पड़ा। आध्यात्मिक लोग विज्ञान के उपकरणो- जैसे लाउडस्पीकर, मोटर कार, रेलगाड़ी, वायुयान आदि का उपयोग तो करते थे किन्तु विज्ञान को जी भरकर कोसते थे। उनका उद्घोष था कि समाज के पतन के लिए विज्ञान ही उत्तरदायी है। दूसरी ओर वैज्ञानिक जगत के लोगों ने अध्यात्म को पांेगा पन्थी एवं ढांेग करार देना प्रारम्भ कर दिया। यह अत्यन्त ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति थी। दोनों ही सत्य के अन्वेषी होते हुए भी एक दूसरे पर कीचड़ उछालने लगे और इस द्वन्द्व की चरम परिणति उस समय हुई, जब दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के क्षणो में जापान के दो नगर, हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराए। इसकी विभीषिका से सभी परिचित हैं। आज तक भी पीढ़ी दर पीढ़ी पर इन बमों के विस्फोट से उत्पन्न रेडियो धर्मिता विद्यमान है और मानव, जीव-जन्तु एवं वनस्पतियां उसके दुष्प्रभाव का शिकार बनी हुई हैं। सम्पूर्ण विश्व में इस घटना के कारण एक बहस छिड़ गई कि अन्तरात्मा के बिना विज्ञान सभी राष्ट्रों का सर्वनाश कर देगा। स्कूल, कालेज और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी इस विषय पर निबन्ध लिखे जाने लगे। आइन्सटाइन बहुत ही गम्भीर हो गए थे और उन्होंने कहा कि ‘धर्म के बिना विज्ञान अन्धा है और विज्ञान के बिना धर्म लगड़ा।’

अतः हम कह सकते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म में सम्बन्ध गहरा है। दोनों एक दूसरे के पूरक है ।

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