हे अबला अब दुर्गा बन जा

by K.R. Kushwah
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आज भेड़िये लूट रहे हैं
देख अकेली नारी को।
हे अबला अब दुर्गा बन जा
छोड़ो इस लाचारी को।

जो भी आँख उठाये उसका
गौरी बन संहार करो ।
याद करो झाँसी की रानी
उस जैसी हुंकार भरो।

कब तक दुख की रोटी सेंको
जाने दो तरकारी को ।
हे अबला अब दुर्गा बन जा
छोड़ो इस लाचारी को।

कब तक जले चिताएं आखिर
कब तक नैना नीर रहे।
लूटें लोग दरिंदे बनकर
क्यूँ ऐसी तकदीर रहे।

हाथों में तलवार उठाकर
सबक सिखा व्यवचारी को।
हे अबला अब दुर्गा बन जा
छोड़ो इस लाचारी को।

मानवता का मीत नहीं तू
दे दे अग्नि जमाने को।
उसके टुकड़े टुकड़े कर जो
बैठा प्यास बुझाने को।

जागो जागो हे रणचंडी
त्यागो चार दिवारी को।
हे अबला अब दुर्गा बन जा
छोड़ो इस लाचारी को।

कोई भेड़िया बच न पाए
तुम ऐसा हथियार बनो।
अपनी ताकत को पहचानो
हरदम नहीं शिकार बनो।

कलयुग में आने से ठहरे
क्या देखो बनवारी को।
हे अबला अब दुर्गा बन जा
छोड़ो इस लाचारी को।

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Anonymous 01/01/2020 - 8:57 PM

सभी पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि कविता के बारे में प्रतिक्रिया अवश्य दें। धन्यवाद!!!

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