मेरे आंगन के हालात

by Dr. Rajmati Surana
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मेरे ऑगन के हालात अभी तक यथावत् ही है,
कुछ नहीं बदला न आचार न विचार…………..
पहले भी मैं अपने ऑगन में खोजती थी अपनी पहचान,
आज तक तलाश रही है ऑखें अपनी पहचान के लिए…

उपासित थी पहले भी और आज भी…….
जिसने जैसा चाहा व्यवहार किया………
मेरे मन मन्दिर को व्यथित किया……
मै इसी ऑगन में बैठ रोती रही…….
अपनी पहचान के लिए बिलखती रही…
मन को मनाती रही पहचान मिलेगी….

मन तो दास था हमारा मान जाता….
दिल में उठे तूफान को शान्त कर जाता
पर प्रश्नो का क्रम मन में न थमता…
ये ऑगन ही तो था जो हमेशा…..
सुख दुःख मे हमारा गवाह बना….
आज इसी ऑगन के समक्ष लेते हैं प्रतिज्ञा..

जो मिटाना चाहते हैं अस्तित्व हमारा…..
उनको देखना तो दूर सोचेंगे भी नहीं….
इसी ऑगन में अपनी नई पहचान बना…
उनके बता देंगे बुरा चाहने वालों…..
मन में कलुषता रखने वालों अधर्मी जन,
राह बदल दी है हमने हम भी रखते हैं दम..

हमको मिटाने वाले मिट्टी में मिल जायेगे…
ये ऑगन तब झूम उठेगा खुशी से……….

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