किसान

by K.R. Kushwah
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दिन व रात कड़ी मेहनत मैं
करता रहता खेतों में।
क्या पढ़ते क्या लिखते हैं कुछ
ध्यान नहीं है बेटों में ।।

बड़े भोर ही चल देता मैं
ले कुदाल निज हाथों में।
मेरे होते हुए न कोई
भूखा सोता रातों में ।।

मैंने अपना सारा जीवन
वार दिया उपकारी में ।
खुशियों के नित फूल खिले हैं
इस जीवन की प्यारी में।।

लू लपटों का मैं हूँ आदी
जाड़ों का मतवाला हूं।
जीवन पोषित करने हेतू
मैं तो एक निवाला हूं ।।

धूल पसीने से मेरा मन
कभी नहीं घबराता है।
देख सुनहरी फसलों को दिल
खुशियों से भर जाता है।।

फटे पुराने ही चिथरो में
शोभा पाती काया है ।
रूप विधाता का धरती पर
कोई समझ न पाया है।।

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2 comments

Anonymous 13/12/2019 - 3:14 PM

धन्यवाद सौरव जी

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Saurabh 05/10/2019 - 12:29 PM

Jai Kisaan.
Very nice poem

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