दिल की व्यथा

by Dr. Awadhesh Tiwari
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मैं काँटों के साथ रहा हूँ
अंगारों से हाथ मिलाऊँ,
विरह अग्नि में धूं धूं जलता,
तीक्ष्ण व्यथा का राग सुनाऊँ।

बैठा हूँ चलभाषी ले कर
पल पल तेरी राह निहारूँ,
अन्तर्जाल पे देख के तुझको
व्यथित हृदय को शान्त कराऊँ।

मेरे सपने अवरोधित हो
धूल-धूसरित ध्वस्त हो गए,
जो मुझको उत्प्रेरित करते
वो तो खुद में व्यस्त हो गए।

पल प्रति पल बेचैनी बढ़ती
आठों पहर भरे हैं नैना ,
तुझ बिन सब कुछ सूना लागे
मिले नहीं इक पल भी चैना।

“भावुक” दिल विरही है लेकिन
तेरा हिय हो मुदित – प्रखर ,
जहाँ कहीं भी रहो ज़हाँ में
मेरे पिय तेरे खिलें अधर ।

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