भीगी हुई ऑखों में

by Dr. Rajmati Surana
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ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
भीगी हुई ऑखों में कोई सपना तो सजा हुआ होगा ।

थक जाते है इंसान नयी डगर की तलाश में,
चलते चलते राह में , कभी तो मुकाम हासिल हुआ होगा ।

तुम्हारे शहर की आबो हवा कितनी जहरीली हुई,
बदरंगी हवाऐ मौसम बिगाड़ रही यह अहसास तो हुआ होगा ।

मौत का मातम ढाती ये बे-नूर फिजाऐ कर रही परेशान,
जंगलों में छाई वीरानगी  ऐसा धीरे-धीरे ही तो  हुआ होगा ।

किसी के हिस्से में धूप तो किसी के हिस्से में छाँव आई,
अपनी किस्मत से कभी तो तुम को नाज हुआ होगा ।

बारिश में कभी तो अपनी  ख़्वाहिशों को भीगने दीजिए,
बादलों की ओट में चाँद आज थोड़ा शरमाया  हुआ होगा ।

चिराग मयस्सर अब कहाँ होते हैं जमाने में  सभी को,
अंधेरे को मिटाने की चाह में कभी कारनामा हुआ होगा ।।

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