पीया पधारे

by Dr. Bijendra Pal Singh
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राह तकत थकि थकि रहे, मेरे दोऊ नैन ।
फागुन में आए नहीं, घर बसन्त मेरे भैन ।।

ज्यों पग धारे देहरी, बरसि परौ अलि मेह।
बौराए ऋतुराज सम,  पीया  पधारे गेह।।

घन बरसे घनघोर सखि,तृप्त मही चहुँ ओर।।
अंग अंग शीतल भया , नाचत दादुर  मोर।।

सौंधी – सौंधी सखि चलै, मंद सुगंधित ब्यार।
फागुन रँगे बसन्त में , गावैं       मंगलचार।।

अमराई बौरी भई ,  द्वारे   देखि  बसंत।
डाल डाल डोलन लगी, अंग लगाए कंत ।।

मटर लदी फल फूल सौं , गेहूं जौ गदरांइ।
सरसों पीरी परि गई, चना चिढ़ावत जांइ।।

आवत बदरा फटि गए, घर आंगन भई कींच।
बरसे मुदित “मयंक” मन, दोऊ अंखियां मींच।।

मो मन बसे बसंत जू, अब “मयंक” नहिँ भाँइ।
कोंपल नई निहारि ज्यों, पात सुहावत नाँइ।।

फागुन चढ़े मुंडेर पै, घर में देखि बसंत।
भौंरा से भन्नात हैं, अंत भया बस अंत।।

हुरियारे मेरे द्वार पै ,  मचा  रहे हुड़दंग।
अंग अंग भीजै सखी, देखि बसंती रंग।।

सपने  में साजन मिले ,  भई  सुहानी   राति।
भोर भई बिछुरे पिया , सिहरि उठी सकुचाति।।

फागुन आबत देखि कैं, हीयरा उठति हिलोर।
लिए कमोरी देहरी,  बैठि   गई  रंग  घोर।।

आऔ गली”मयंक” जू, लै पिचकारी हाथ।
रँगूँ आपने रंग में ,  रसिया   सिगरौ  गात।।

परु रँगु डारौ चीर पै , अब तकि छूटौ नाँइ।
एसों मैं ऐसौ रँगूँ ,  रंग  सुरग  तकि  जाँइ ।।

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