राजनीती के चेहरे

by Dr. Bijendra Pal Singh
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मौन सारे हो गए वाचाल मेरे देश के।
बेसुरे से हो गए सुर ताल मेरे देश के ।

मौत का तांडव मचा चहुँ ओर हा हा हा कार है।
लिपटे पड़े हैं आँकड़ों में लाल मेरे देश के।

खेलते हैं खेल कीचड़ से औ होली खून से।
बद से बदतर हो गए हैं हाल मेरे देश के ।

इंसानियत दम तोड़ती अच्छे दिनों के ख्वाब में ।
दही माखन खा गए नँदलाल मेरे देश के ।

सब के सब निर्दोष हैं दोषी भी और निर्दोष भी।
कैसी बदलते हैं सयाने चाल मेरे देश के ।

तुम न आ पाओ भले अवतार कोई भेज दो ।
काट दे पल भर में सारे जाल मेरे देश के ।

अब सहा जाता नहीं तम पाप का घट भर गया।
आ पचा तू भी”मयंक”कुछ माल मेरे देश के।

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