विश्वास..

by Surekha "Sunil" Sharma
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सूरज ढलने को था लेकिन मयंक का घर वापस जाने का बिल्कुल मन नहीं था, जाए भी तो कैसे! आज उसे जिस आदमी से पैसे लेने थे उसका एक्सीडेंट हो गया था।

 घर का मानो सारा हिसाब किताब बिगड़ गया, जो थोड़े पैसे थे उसके पास, वह भी सुबह से शाम तक ऑफिस में खत्म हो गए। उसके मन में बार-बार अपने परिवार का ख्याल आ रहा था। आज उसके बेटे का जन्मदिन था, इसलिए बार-बार सारा ध्यान बच्चे की तरफ लग रहा था। उसके लिए कपड़े खिलौने खरीदने हैं। कितने प्यार  से बोला था,”पापा एक अच्छा सा केक भी लाना।“

 लेकिन अब वह करें भी तो क्या करें? भगवान की मर्जी समझकर घर की और चल दिया। रास्ते भर यही सोचता रहा कि बच्चे से नजरें कैसे मिलाएगा। घर से थोड़ी दूरी पर ही पड़ोस के मिश्रा जी मिल गए, उन्हें अचानक किसी काम से दिल्ली जाना था, उन्हें जो तनख्वाह मिली थी, उसे मयंक के हाथ में रख कर बोले, “मैं अगले हफ्ते आऊंगा तब तक के लिए यह पैसे तुम अपने घर में रख लो, मैं तुमसे आकर ले लूंगा!”

एक पल के लिए जैसे मयंक को अपने बच्चे की खुशियां मिल गई हो, लेकिन फिर उदास होकर सोचने लगा क्या दूसरे का पैसा खर्च करना सही होगा। इसी उधेड़बुन में लगा रहा और ना जाने घर कब आ गया, पता ही नहीं चला। उसने धीरे से डरते हुए डोरबेल बजाई, धीरे से अंदर आकर देखा तो चैन की सांस ली! बाबू सो गया था और मयंक उसे बहुत कातर निगाहों से ताकता रहा।

 पत्नी के हाथ से पानी का गिलास लेते हुए बोला –“बाबू मेरे आने से पहले ही बिना जन्मदिन मनाए कैसे सो गया? मैं कैसा पिता हूं, अपने बच्चे की एक इच्छा भी पूरी नहीं कर पाया। मुझे माफ कर दो, मैं तुम्हारी और बाबू का ध्यान नहीं रख पा रहा हूं। कोई खुशी नहीं दे पा रहा हूं।“ और आंखों से अश्रु धारा बह निकले।

पत्नी बोली, “अरे —ऐसे क्यों कह रहे हो आप ?? भगवान ने जितना दिया है, उतने में ही खुश हूं संतुष्ट हूं, लेकिन आप आज  ऐसी बातें क्यों कर रहे हो। मयंक ने पत्नी को बच्चे की सारी बातें बताई और यह भी बताया- कि उसके मालिक का एक्सीडेंट हो गया है इसलिए पैसे भी नहीं मिले।

पत्नी मंद मंद मुस्कुराते हुए बोली, “बस इतनी सी बात– जिसके लिए इतने परेशान हो –आप के मालिक ने बाबू के कपड़े केक खाने पीने का बहुत सारा सामान भेज दिया था बाबू अपना जन्मदिन मना कर ही सोया है। अरे हम कौन होते हैं, अच्छा या बुरा सोचने वाले ऊपर वाले की मर्जी से होता है, जो होता है। आज मालिक के बेटे का भी जन्मदिन था इसीलिए वह इतना सारा सामान दे गए थे।“ मयंक की आंखों में खुशी के आंसू थे आज उसे फिर एक बार ईश्वर और उसकी शक्ति पर विश्वास हो गया था।

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