अतीत से अस्तित्व..

by Nisha Nandini
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शीला आज उम्र के पचासवें पढ़ाव पर आकर अपनी दादी माँ को बहुत याद करती है। जिसका मुख्य कारण यह है कि उसकी दादी माँ प्रसिद्ध साहित्यकार मनोरमा देवी द्वारा दिया गया मंत्र है। जिससे वह अपने आप को बहुत शांत- ताज़ा और तनाव रहित महसूस करती है। 

शीला की सहेली मीरा भी उसकी ही हमउम्र है पर हमेशा तनाव में रहती है। अपने माता-पिता को याद करके रोती रहती है। उसकी ससुराल पक्ष के लोग अच्छे नहीं हैं। एक दिन वह अपनी सहेली शीला के घर आयी और रोते-रोते उसने अपनी आपबीती सुनाई। शीला ने मीरा से पूछा- तुम्हारे जीवन का उद्देश्य क्या है। मीरा ने बताया अब तो कोई उद्देश्य नहीं है लेकिन जब मैं अपने माता-पिता के घर थी तब बहुत लिखती थी। मेरी डायरी में आज भी वो सब कविताएं और कहानियाँ लिखी हुई हैं। जिन पर मुझे विद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर पुरस्कार मिला है। मीरा ने कहा-अब तो समय ही नहीं मिलता है। घर गृहस्थी के कामों में उलझी रहती हूँ और बहुत परेशान रहती हूँ। परिवार का कोई सदस्य मुझे महत्व नहीं देता है। 

शीला ने कहा- मेरी दादी माँ ने यह मंत्र दिया था कि पहले तो अपने जीवन का एक उद्देश्य बनाओ उस पर चलते रहो। दूसरा अपने अतीत से स्वयं सीख लो। ग़लती करना स्वाभाविक है पर एक ग़लती दोबारा मत करो। ग़लती करो, आगे बढ़ो। हमारा अतीत हमारा सबसे बड़ा गुरू है। 

बीच-बीच में अतीत में झांककर सीख लेना चाहिए। हमारे अतीत में ही हमारा अस्तित्व छिपा है। 

शीला ने बताया कि मैं अपनी दादी माँ की यह सीख कभी नहीं भूलती हूँ और हमेशा प्रसन्न रहकर अपने उद्देश्य की ओर बढ़ रही हूं। 

मीरा को शीला की दादी की बात बहुत अच्छी लगी। उसने प्रण किया कि वह भी आज से अपने जीवन का एक लक्ष्य चुनेगी। अपनी दबी इच्छाओं को पूरा करेगी। मीरा ने सब प्रथम अपनी अधूरी शिक्षा को पूरा करने का प्रण लिया। बहुत अच्छे अंकों से उसने एम.ए की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद मीरा ने शीला के साथ मिलकर अपने घर के पास ही ग़रीब बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। अब मीरा के दिन बदलने लगे थे। वह अपने घर का काम जल्दी-जल्दी पूरा करके गाँव के ग़रीब बच्चों को पढ़ाती थी। बदले में गाँव के बच्चों का प्यार मिलता था। बच्चे अपने खेत की ताजी सब्ज़ियाँ व फल मीरा दीदी को भेंट स्वरूप देते थे। अब मीरा का जीवन बिल्कुल बदल चुका था। वह गाँव में बच्चों के घर जाती, उनके खेतों का निरिक्षण करती थी। उन लोगों के साथ ढेर सारी बातें करती थी और अपनी प्रतिदिन की दिनचर्या को एक कॉपी में लिखती जाती थी। अब मीरा तनावमुक्त रहती थी। वह मीरा जिसको पूरी-पूरी रात नींद नहीं आती थी। अब बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में सो जाती।

अपने लक्ष्य को पूरा करने के सपने देखती थी। बच्चे बढ़े हो चुके थे। उनका विवाह चुका था। आज साठ वर्ष की आयु में भी निरोगी होकर मीरा बड़ी तल्लीनता व लगन से अपना कार्य कर रही थी। परिवार के लोग क्या बोलते हैं इसकी चिंता छोड़कर अब वह बहुत खुश थी। शीला भी मीरा को खुश देखकर बहुत खुश होती थी। दोनों सहेलियाँ रोज़ मिलती और बातें करती कि आज हम अपने अतीत से कट कर पंगु होते जा रहे हैं। हमारे देश का अतीत ज्ञान का भंडार है। जड़ों से कटकर कोई सुखी नहीं रह सकता है। दोनों गाँव के लोगों से बहुत सी बातों को सीखती थीं और सिखाती थी। ग्रामवासियों को श्रीमद् भगवद् गीता का रहस्य समझाती। वेदों में छिपे ज्ञान का उल्लेख करती थी। 

इधर मीरा ने अपनी एक और इच्छा को पूरा किया। मीरा जो प्रतिदिन की दिनचर्या लिखती थी, उसे उसने एक पुस्तक का रूप देकर प्रकाशित करवा लिया। लोगों ने उस पुस्तक की बहुत प्रशंसा की। मीरा को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। 

शीला की दादी माँ के मंत्र से मीरा का जीवन बिल्कुल बदल चुका था। वह मन ही मन दादी माँ को नमन करती, शीला की कृतज्ञता ज्ञापन करती थी। 

मीरा को जहां भी वक्तव्य देने के लिए बुलाया जाता था। वहां वह दादी माँ का मंत्र देना नहीं भूलती थी। पहला वाक्य यही बोलती थी कि हमारे अतीत में ही हमारा अस्तित्व छिपा है। उसको पहचानो और अपने लक्ष्य पर बढ़ो।

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